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शिवजी की पूजा मूर्ति तथा शिवलिंग दोनों रूपों में की जाती है शिव के गले में नाग देवता विराजमान करते हैं तथा उनके हाथों में डमरू और त्रिशूल होता है.

क्षम्यतां नाथ, अधुना अस्माकं दोषः अस्ति।

शिव चालीसा - जय गिरिजा पति दीन दयाला । सदा करत सन्तन प्रतिपाला.

त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव…॥

लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।

जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

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शिव पंचाक्षर स्तोत्र

शङ्करस्य सम्मुखे पाठस्य पाठं कुर्वन्तु।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥

पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

जय सन्तोषी मात अनूपम। read more शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥ सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा। वेश मनोहर ललित अनुपा॥

अर्थ- हे भोलेनाथ आपको नमन है। जिसका ब्रह्मा आदि देवता भी भेद न जान सके, हे शिव आपकी जय हो। जो भी इस पाठ को मन लगाकर करेगा, शिव शम्भु उनकी रक्षा करेंगें, आपकी कृपा उन पर बरसेगी।

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